Posts

श्रीरामायणजी की आरती

श्रीरामायणजी की आरती * आरती श्रीरामायणजी की। कीरति कलित ललित सिय पी की।। गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान बिसारद।। सुक सनकादि सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत की‍रति नीकी।। गावत बेद पुरान अष्टदस। छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस।। मुनि जन धन संतन को सरबस। सार अंस संमत सबही की।। गावत संतत संभु भवानी। अरु घट संभव मुनि बिग्यानी।। ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गरुड के ही की।। कलिमल हरनि बिषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की।। दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब बिधि तुलसी की।। आरती श्रीरामायणजी की। कीरति कलित ललित सिय पी की।। ------ जय श्रीरामचंद्रजी की---- पवनसुत हनुमान की जय  

रामायण माहात्म्य, तुलसी विनय और फलस्तुति

रामायण माहात्म्य ,  तुलसी विनय और फलस्तुति *  पूँछिहु राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि॥ सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा॥ 3 ॥   भावार्थ:- जो आपने मुझ से शुकदेवजी ,  सनकादि और शिवजी के मन को प्रिय लगने वाली अति पवित्र रामकथा पूछी। संसार में घड़ी भर का अथवा पल भर का एक बार का भी सत्संग दुर्लभ है॥ 3 ॥ *  देखु गरु़ड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी॥ सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन॥ 4 ॥   भावार्थ:- हे गरुड़जी! अपने हृदय में विचार कर देखिए ,  क्या मैं भी श्री रामजी के भजन का अधिकारी हूँ ?  पक्षियों में सबसे नीच और सब प्रकार से अपवित्र हूँ ,  परंतु ऐसा होने पर भी प्रभु ने मुझको सारे जगत्‌ को पवित्र करने वाला प्रसिद्ध कर दिया॥ 4 ॥ दोहा : *  आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन। निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन॥ 123  क॥   भावार्थ:- यद्यपि मैं सब प्रकार से हीन (नीच) हूँ ,  तो भी आज मैं धन्य हूँ ,  अत्यंत धन्य हूँ ,  जो श्री रामजी ने मुझे अपना...